शिशुओं के जीवन की आधारशिला तय करता है पहले 1000 दिन का पोषण

  •     पोषण और विकास के लिहाज से शिशुओं के लिए होता है जीवन का सुनहरा काल
  •     गर्भकाल से लेकर पहले दो साल तक बच्‍चों को मां के दूध के साथ मिले पूरक आहार
-डॉ सलोनी श्रीवास्‍तव

यह 1000 दिन बच्चे के विकास, बढ़त और स्वास्थ्य  के लिए एक महत्वपूर्ण अवधि है जिसमें हम बच्चे व माँ को सही समय व सही पोषण प्रदान कर उसे एक स्वस्थ व खुशहाल जीवन दे  सकते हैं। कुपोषण का एक चक्र होता है और इस चक्र को तोड़ना अत्यंत आवश्यक है।
                                                                                                                -डॉ सलोनी श्रीवास्‍तव 

 

 

संतकबीरनगर। बच्‍चों के लिए गर्भावस्था से लेकर दो वर्ष तक का समय उनके सर्वांगीण विकास के लिए एक अनूठा अवसर होता है। इसी दौरान बच्चों के संपूर्ण स्वास्थ्य, वृद्धि और विकास की आधारशिला तैयार होती है,जो पूरे जीवन बच्चे के काम आती है। लेकिन अक्सर गरीबी और कुपोषण के कारण यह आधारशिला कमजोर हो जाती है, जिसके कारण समय पूर्व मौत और शारीरिक विकास प्रभावित होता है। इसलिए पहले 1000 दिनों तक बच्‍चे की मां और शिशु के पोषण पर विशेष ध्यान दिया जाता हैं |

सामुदायिक स्‍वास्‍थ्‍य केन्‍द्र खलीलाबाद की महिला चिकित्‍सक डॉ सलोनी श्रीवास्‍तव बताती हैं कि यह 1000 दिन बच्चे के विकास, बढ़त औरस्वास्थ्य  के लिए एक महत्वपूर्ण अवधि है जिसमें हम बच्चे व माँ को सही समय व सही पोषण प्रदान कर उसे एक स्वस्थ व खुशहाल जीवन दे  सकते हैं। कुपोषण का एक चक्र होता है और इस चक्र को तोड़ना अत्यंत आवश्यक है। यदि एक किशोरी कुपोषित है तो वह भविष्य में जब गर्भवती होगी तो वह कुपोषित ही रहेगी और एक कुपोषित बच्चे को जन्म देगी। प्रथम 1000 दिनों में उपलब्ध पोषण बच्चों को जटिल बीमारियों से लड़ने की ताक़त देता है। बच्चे के जीवन के प्रथम 1000दिनों में उचित पोषण की कमी के ऐसे दुष्परिणाम हो सकते हैं जिन्हें ठीक करना आसान नहीं होता। यह नहीं सोचना चाहिए कि बच्चा जब दुनिया में आएगा तब ही उसके खान-पान पर ध्यान देना है। बल्कि बच्चा जिस दिन से माँ के गर्भ में आता है उसी दिन से उसका शारीरिक मानसिक विकास होना प्रारंभ होने लगता है। प्रसव के बाद 6 माह तक शिशु को केवल स्तनपान कराना चाहिए तथा 6 माह के बाद बच्चे को कम से कम दिन में दो से तीन बार खाना खिलाये और चम्मच से खिलाये ताकि बच्चें को आदत पड़ सके। शुरू-शुरू में बच्‍चा थूकेगा पर ऐसे ही सीखना शुरू करेगा। पूरक आहार न लेने से बच्चा इसी उम्र से कुपोषित होना शुरू हो जाता हैं। बच्चे को एनीमिया, विटामिन ए की कमी, जिंक की कमी हो सकती है।

संतकबीरनगर में 50.5 प्रतिशत बौनापन

यूपीटीएसयू के जिला पोषण विशेषज्ञ अजिथ रामचन्‍द्रन बताते हैं कि एनएफएचएस-4 यानी नेशनल फैमिली हेल्‍थ सर्वे – 4 (2015-16) के अनुसार संतकबीरनगर जनपद में 5 वर्ष से कम उम्र के लगभग 50.5 प्रतिशत बच्चे बौने हैं या उम्र की तुलना काफी छोटे हैं, जो यह बतलाता है कि वे कुछ समय के लिए कुपोषित रहे हैं। 10.9 प्रतिशत बच्चों में सूखापन है या कहें कि शरीर की लंबाई की तुलना में काफी दुबले हैं, जो कि पोषक आहार न मिलने या हालिया बीमारी का कारण हो सकता है। लगभग 36.5 प्रतिशत बच्चों का वजन कम है। साथ ही 2.5 प्रतिशत ऐसे हैं जो गंभीर सूखापन से ग्रसित हैं।  यह पुराने और गंभीर कुपोषण का कारण हो सकता है।

पोषण स्तर किस प्रकार प्रभावित होता है ?

पोषण स्तर मुख्यतः तीन कारकों से प्रभावित होता है – भोजन, स्वास्थ्य देखभाल। अधिकतम पोषण संबंधी परिणाम तभी प्राप्त हो सकते हैं जब किफ़ायती एवं विविध पोषक तत्व युक्त भोजन तक पहुँच हो,उपयुक्त मातृ एवं शिशु देखभाल अभ्यास हो, पर्याप्त स्वास्थ्य सुविधाएं हों, और सुरक्षित व स्वच्छ पेयजल तथा स्वच्छ वातावरण हो।

1000 दिनों का इस प्रकार होता है विभाजन

एक शिशु के विकास के 1000 दिनों का विभाजन शिशु के जन्‍म से दो साल तक के लिए होता है। इसमें 270 दिन यानी 9 महीने तक गर्भावस्‍था के दौरान पोषण तथा दो साल यानी 730 दिनों के लिए विकास की विभिन्‍न प्रक्रियाओं के दौरान पोषण का होता है।

विभिन्‍न स्‍तरों पर 1000 दिन इस प्रकार दें पोषण

जिला संयुक्‍त चिकित्‍सालय संतकबीरनगर के बाल रोग विशेषज्ञ डॉ आर पी राय बताते हैं कि बच्‍चे के विकास के 1000 दिनों के पोषण को इस प्रकार से विभाजित किया गया है। माता अपनी गर्भावस्था में आयरन व फोलिक एसिड से भरपूर भोजन, जो कि गर्भ में पल रहे बच्चे के विकास व बढ़त के लिए जरूरी है। वहीं 6 माह के शिशु के लिए माँ का दूध 6 माह तक बच्चे की सभी पोषक तत्वों की आवश्यकताओं की पूर्ति करता है। अतः 6 माह तक शिशु को केवल स्तनपान कराना चाहिए। 6 माह से 2 साल तक मां के दूध के अलावा  इस अवस्था में फल, फलियाँ व प्रोटीनयुक्त पदार्थ  जैसे अण्‍डा इत्‍यादि  बच्चों को दिया जाना चाहिए जो कि उनके सम्पूर्ण विकास में महत्वपूर्ण भूमिका अदा करते हैं।

गर्भावस्था के दौरान रखें यह सावधानियां

गर्भावस्था की पहचान होने पर अतिशीघ्र निकटतम स्वास्थ्य केंद्र पर जाकर पंजीकरण करना, नियमित जांच कराना, पौष्टिक व संतुलित आहार का सेवन करना, स्तनपान के संबध में उचित जानकारी प्राप्त करना, चिकित्सक द्वारा दिए गए परामर्शों का पालन करना सुनिश्चित करना, जन्म के 1 घंटे के भीतर बच्चे को स्तनपान कराएं। बच्‍चों को 6 माह तक केवल स्तनपान कराना चाहिए। 6 माह के बाद ऊपरी आहार की शुरुआत करना चाहिए। नियमित स्वास्थय जांच कराना चाहिए। शिशु व बच्चे का नियमित व समय से टीकाकरण करना चाहिए।