शौहार्द अमन चैन की मिशाल है यह बांदा ,यहां पर सब शान्ति -शान्ति है

  • कड़ी सुरक्षा के बीच निकला बारह वफात का जुलूस
  • ड्रोन कैमरे की मदद से की जाएगी पूरे जुलूस की निगरानी
  • अयोध्या मामले को देखते हुए किए गए हैं त्यौहार में सुरक्षा के कड़े इंतजामात
  • हर्ष और उल्लास के साथ निकाला गया ईद उल मिलाद उल नबी (बारह वफात) का जुलूस
  • गंगा जमुनी तहजीब की शुरुआत यही से हुई थी

 

रिपोर्ट- अरविन्द श्रीवास्तव

बांदा। जैसा कि आप सभी लोग जानते हैं कि कल ही अयोध्या के विवादित मामले का फैसला आया था ।उसी के बाद आज मुस्लिम समुदाय का त्योहार भी मनाया जा रहा है जिसको देखते हुए सुरक्षा के कड़े इंतजाम किए गए हैं ।लेकिन बुंदेलखंड की गंगा जमुनी के आगे सारी सुरक्षा व्यवस्था फेल होती हुई नजर आती है।

क्योकि जनपद में सभी हिन्दू/मुस्लिम समुदाय के लोग हर त्योहार को बड़े ही प्रेम भाव के साथ मनाते हैं। इसी को देखते हुए आज जनपद बाँदा में मुस्लिम समुदाय का त्योहार ईद उल मिलाद उल नबी 12 वफात मनाया जा रहा है।

जिसमें हिंदू और मुस्लिम समुदाय के लोग नए -नए कपड़े पहन कर जुलूस में शामिल होते हैं और मोहम्मद साहब को याद करते हैं जुलूस में भाग लेने वाले लोगों को हिंदू भाइयों और मुस्लिम भाइयों के द्वारा जगह-जगह स्टॉल लगाकर खाने-पीने की सामग्री (लंगर) पलब्ध कराई जाती है

इतना ही नहीं इस भारी जुलूस को देखते हुए पुलिस प्रशासन व जिला प्रशासन के द्वारा भारी सुरक्षा का इंतजाम किया गया है जनपद में पुलिस के द्वारा कई टुकड़ों में सुरक्षा व्यवस्था तैनात की गई है इसके अलावा हवाई सुरक्षा का भी इंतजाम किया गया है जिसमें ड्रोन कैमरे की मदद से पूरे जुलूस की निगरानी की जा रही है।

 

इस्लाम पर्वों की बात करते समय हम मुहर्रम, ईद-उल-फितर और ईद-उल-अजहा से ही अधिकतर वाकिफ होते हैं। पैगंबर हजरत मोहम्मद और उनकी शिक्षा को ये दिन समर्पित किया जाता है। कई स्थानों ईद-ए-मिलाद को पैगंबर के जन्मदिन के रुप में और कई स्थानों पर इसे शोक दिवस के रुप में मनाया जाता है, माना जाता है कि इस दिन ही पैगंबर की मृत्यु हुई थी। मान्यताओं के अनुसार कहा जाता है कि पैगंबर हजरत मोहम्मद का जन्म इस्लाम कैलेंडर के अनुसार रबि-उल-अव्वल माह के 12वें दिन 570 ई. को मक्का में हुआ था।

कुरान के अनुसार ईद-ए-मिलाद को मौलिद मावलिद के नाम से भी जाना जाता है जिसका अर्थ होता है पैगंबर के जन्म का दिन। इस दिन रात भर तक सभाएं की जाती हैं और उनकी शिक्षा को समझा जाता है। माना जाता है कि पैगंबर की शिक्षा को सुना जाए तो वो जन्नत के द्वार खोलती हैं। इस दिन के लिए शिया और सुन्नी दोनों के अलग मत हैं। शिया समुदाय पैगंबर हजरत मुहम्मद के जन्म की खुशी में इसे मनाता है और वहीं सुन्नी समुदाय कुछ फिरकों का मानना है कि ये दिन उनकी मौत का दिन है, इस कारण वो पूरे माह शोक मनाते हैं। हालांकि सुन्नियों में खासतौर पर पैगंबर के जन्मदिन का जश्न बरेलवी समुदाय द्वारा मनाया जाता है ।

ईद-ए-मिलाद के दिन सभी लोग अपने घरों को सजाते हैं और मस्जिदों में नमाज अता की जाती है और लाईटों आदि से सजाया जाता है। जरुरतमंदों को इस दिन भोजन करवाया जाता है। मस्जिदों और सामूहिक सम्मेलनों में मुहम्मद से जुड़ी शायरी और कविताएं पढ़ी जाती हैं। भारत के मुस्लिमों के लिए भी ये महत्वपूर्ण दिन होता है। सभी लोग नमाज पढ़ने जाते हैं और उसके बाद अन्य कार्यक्रमों में हिस्सा लेते हैं।