घास क्यो गणेश जी को पसंद है? दूर्वा क्यों चढ़ाते हैं

ज्योतिषाचार्य डॉ उमाशंकर मिश्र 

पृथ्वी से आकाश को देखने पर स्थिर दिखने वाले पिडो व छायाओं को नक्षत्र और स्थिति बदलने वाले को ग्रह कहा जाता है। अकाशगंगा से नक्षत्र और ग्रह की आने वाली तरंगे, टीवी के एंटीना के समान आकर्षित होकर पृथ्वी पर समाहित होती हैं। भारतीय ज्योतिष में ग्रहों की संख्या नौ और नक्षत्र सताईश है, इसलिए इन्हें नवग्रह कहा जाता है। इनमें सूर्य, चंद्र, मंगल, बुध, बृहस्पति, शुक्र, शनि, राहु व केतु है। इनमें पहले सात पिंडीय ग्रह है, जबकि राहु व केतु छाया ग्रह है। जिसका सीधा प्रभाव पृथ्वी के सभी जीवधारियों और पेड़-पौधो पर होता है। इससे कोई भी अछूता नही रह सकता है।

ज्योतिष और वनस्पति विज्ञान प्रकृति मे एक दूसरे के पूरक हैं। पशु-पक्षी, जीव-जन्तु औषधिया-वनस्पतिया पेड़-पौधे नर-नारी देवी-देवता इन सभी पर कही ना कही नक्षत्रो और ग्रहो का प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष प्रभाव रहता है। इसीलिए ग्रहों की स्थिति के साथ ही परिस्थियों मे भी हर समय बदलाव पड़ता रहता हैं।

ग्रहों का विभिन्न-विभिन्न नक्षत्रों में भिन्न-भिन्न प्रकार से अनुकूल व प्रतिकूल प्रभाव रहते है। ग्रहों के प्रतिकूल प्रभाव को कम करने के अनेक उपाय हैं। आयुर्वेद की औषधियों की भांति ज्योतिष में भी पेड़-पौधो का इस्तेमाल ग्रहों के दुष्प्रभावों को कम करने के लिए होता रहा है। हर पेड़-पौधे किसी न किसी ग्रह से संबंधित है। कुछ पेड़-पौधे को विशेष रूप से ग्रहो के लिए चिन्हित किया गया है, जो ग्रह शांति के लिए सटीकताकाम करते हैं। जिनका उपयोग या प्रयोग अथवा देखभाल से पर्यावरण संरक्षण के साथ ही जीवन मेंसुख और संपन्नता,मानसिक और शारीरिक स्वास्थ्य हासिल होता है और वास्तु संबंधी दोष पेड़-पौधे दूर करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते है। इन्ही पेड़-पौधे मे घास जिसे हम सभी जानते है।

और भली प्रकार से पहचानते भी है। इसकी उपस्थिति पूरे विश्व मे है, जहा-जहा भूमि है, वहा-वहा घास है। इसलिए हम इसे उतना महत्व नही देते, इसे जानवरो का मात्र चारा ही मान के बैठे है, पर भारतीय संस्कृति मे बिना दूब घास के कोई मंगल कार्य संभव ही नही है। भारतीय ऋषियों और धर्म के जानकारो ने बहुत पहले ही पशु-पक्षी, जीव-जन्तु औषधिया-वनस्पतियां पेड़-पौधे नर-नारी देवी-देवता इन सभी का गुण और उपयोग समझकर इन्हे अपने धार्मिक अनुष्ठानो मे स्थान देते चले गए और आज दशा यह है कि इन छोटी छोटी चीजो के ना होने पर अनुष्ठान पूर्ण होता ही नहीं है। इन्ही चीजों मे एक मामूली सी घास उपाय के रूप मे क्या क्या करिश्मा करती है। यह जानना जरूरी है, क्योकि घास पूरी दुनिया मे है जगह जगह पर है।

दूब की विशेषता
दुर्वा त्रिदोष को हरने वाली औषधि है। दूब या दुर्वा मे एन्टीवायरल, एन्टीमाइक्रोबियल, एन्टीइन्फ्लेमेटरी, एन्टीसप्टिक का गुण उपलब्ध है एवं फ्लेवनाइड, प्रोलेक्टिन हार्मोन और विटामिन‘ए’ का प्रमुख स्रोत भी है।इन्ही गुणो के कारण ही घास को महौषधि, अमृता, सहस्त्रवीर्य और अनंता की उपाधि मिली हुई है। दूर्वा पेट के रोगों, वात कफ पित्त के समस्त विकारों, दाह शामक, रक्तदोष, मूर्छा, अतिसार, अर्श, रक्त पित्त, प्रदर, गर्भस्राव, गर्भपात, यौन रोगों, मूत्रकृच्छ, कान्तिवर्धक, रक्त स्तंभक, उदर रोग, पीलिया इत्यादि में प्रभावी चमत्कार दिखाने मे सक्षम है। श्वेत दूर्वा विशेषतः वमन, कफ, पित्त, दाह, आमातिसार, रक्त पित्त, एवं कास आदि विकारों में विशेष रूप से प्रयोजनीय है। दूब को राहू की वनस्पति और गणेश जी का प्रिय माना गया है। कही-कही केतू के प्रभावों को भी निष्फल करने मे दूब भूमिका तय करता है। दूब का राहू और गणेश जी का क्यो इतना गहरा रिश्ता है, इसका कोई न कोई कारण तो अवश्य ही है। क्यो हमारे मनीषियों, ज्ञानियों ने यू ही, सामान्य सी घास को इतना महत्वपूर्ण स्थान दिया हुआ है। दूब के औषधीय गुणो को जानने के बाद यह समझना भी जरूरी हो जाता है कि आखिर गणेश जी के लिए दूब ही क्यो आवश्यक मानी गयी और कोई वनस्पति क्यो नहीं…?

गणेश और दूब का रिश्ता
भगवान गणेश सभी जीव-जन्तुओ ज्ञान और बुद्धि देने वाले और समय समय पर जाग्रत करने वाले देव के साथ ही देवताओं के भी ईश्वर हैं। प्रत्येक शुभ एवं मंगल कार्य श्रीगणेश के बिना अधूरा है और गणेश जी की पूजा-अर्चना बिना दूर्वा के पूर्ण नहीं, ऐसा शास्त्रो मे अंकित है। शायद इसीलिए श्री गणेश को दूर्वा चढ़ाने की परंपरा है। दूब के औषधीय गुण के कारण ही गणेश जी और दूर्वा का इतना गहरा संबंध है, जो बिना दूब के पूजा को ही अधूरा बताया गया है। सिर्फ गणेश जी को दूब सहित छू लेना ही सब दोष दूर होते है। दूब को छूने या देखने से मन को अपार शांति मिलती है। सर्वव्यापकता के लिए आठों दिशाओं में फैली भुजाएँ, सृष्टिचक्र सूचक बड़ा पेट(लंबोदर), तीव्र ग्राह्यशक्ति के लिए बड़े कान, सूक्ष्म-तीक्ष्ण दृष्टिसूचक छोटी-पैनी आँख, महाशक्ति का प्रतीक लंबीनाक (सूंड) एवं तीक्षण बुद्धिकारक मस्तक से गणेश जी की पहचान की जा सकती है। संसार मे जो भी साधन है, उसके देव गणपति जी ही है- जैसे–

1.जीवन के लिए आहार जरूरी है, तो बिना अन्न या अनाज आहार संभव नही अर्थात अनाज जीवन का साधन है, यानि अनाज गणेश है।
2. अनाज को किसान की आवश्यकता है,तो किसान गणेश है।
3. किसान को अनाज उगाने हेतु खेतऔर बीज़ की आवश्यक्ता होती है, तो बीज़ और खेत गणेश है।
4. अनाज का भण्डारण आवश्यकहै तो भण्डारागारभी गणेश है।
5. अनाज के लिए धन या परिश्रम आवश्यकहै,तो बल और धनभी गणेश है।
6. खाने के लिये मुह हाथआवश्यकहै, तो हाथऔर मुह गणेश है।
7. खाने के लिये दाँतों आवश्यकहै, तो दाँत गणेश है।
कहने का तात्पर्य यह है कि साधन और साधना दोनों गणेश के बिना पूरी नहीं होती, और भोले शंकर और गौरी के लाल गणेश इसीलिए सर्वपूजित है। दूब घास भी सर्वव्यापी होने के साथ ही दुर्वा त्रिदोष को हरने वाली औषधि है, जो हर परिस्थितियो मे उपलब्ध है और सर्वग्राह्य है। दुख शोक, संताप को दूर कर शक्तिशाली बनाने की अचूक ताकत है दूब मे यही कारण है कि दूब और गणेश एक शक्ति का दूसरी शक्ति मे विलय कहा जाएगा।

राहू-केतू के साथ दूब का सम्बन्ध
राहू दूब विशेष रूप से राहु की वनस्पति मानी जाती है। ऐसा क्यो अगर ये समझ गए, तो राहू-केतु क्या आप हर ग्रह का उपचार स्वयम कर सकते है। पृथ्वी के सापेक्ष एक दुसरे के उल्टी दिशा में सूर्य एवं चंद्र के परिक्रमा पथको काटने वाले छाया ग्रह को राहू-केतु हैं। ये ग्रह कोई खगोलीय पिंड नहोने के कारणइन्हें छाया ग्रह कहा जाता है। जब पूर्णिमा के समयचाँद राहू (अथवा केतु) के बिंदु पर रहे, तो पृथ्वी की छाया पड़ने से चंद्र ग्रहण लगता है, क्योंकि पूर्णिमा के समय चंद्रमा और सूर्य एक दुसरे के उलटी दिशा में होते हैं। जिस पर शास्त्रीय श्लोक “वक्र चंद्रमा ग्रसे ना राहू”है विज्ञान में राहू एवं केतु को क्रमशः उत्तरी एवं दक्षिणी लूनर नोड कहते हैं। सूर्य और चंद्र के ब्रह्मांड में अपने-अपने पथ पर चलने के अनुसार ही राहु और केतु की स्थिति भी बदलती रहती है। पौराणिकमतानुसार राहु के तम, असुर, आगु, स्वभीनु, विंधुंतुर, धाता, सैहिकेय, भुजंग, भुजग ये नाम है और रंग नीला है, लेकिन विशेषज्ञ काला कहते है। काला रंग स्थिरता कारक है, परंतु काला रंग ज्यादा उपयोग उग्रता को जन्म देता है,काला रंग बहुत ही उपयोगी साबित हो सकता है यदि इसका प्रयोग अच्छे से समझ लें।राहु का असर कांटेदार जंगली चूहा, नारियल का पेड़, कुत्ता, घास, नीलम, सिक्का, गोमेद पर रहता है। राहु शक्तिवर्धन, शत्रुओं को सम्मोहित कर मित्र बनाने मे सक्षम है। राहु ज्ञानकारक कहलाने के विपरीत यदि पाप ग्रहों से युत होता है तो मंद बुद्धि या पागलपन भी पैदा कर सकता है और यदि शुभ ग्रहों से युत होने की स्थिति मे जातक सफलता व प्रगति के शिखर को छूता है। राहु सुखार्थियों, विदेशी भूमि में संपदा विक्रेता, धनवान आदि का प्रतीक है। राहु का कमजोर होना अस्थिता को जन्म देता है। राहु दोषपूर्ण होने पर मानसिक तनाव, आर्थिक नुकसान, स्वयं की ग़लतफहमी, तालमेल में कमी,बात बात पर सयम खोना, वाणी का कठोर होना और अपशब्द बोलना,राहू ज्यादा विपरीत होने पर हाथ के नाखून अपने आप टूटने लगते हैं और अधार्मिक, निर्वासित, कठोरवक्ता, मिथ्याभाषी, मलिनता का द्योतक भी रहा है। राहू पेट में अल्सर, हड्डियों और स्थानांतरगमन की समस्याएं देता हैं। राहु धोखेबाजों, ड्रग विक्रेता, विष व्यापारी, निष्ठाहीन और अनैतिक कृत्य भी देता हैं। राहू को पाप का राजा माना जाता है। बौद्ध धर्मानुसार राहु क्रोध का देवता है।

केतू  केतू राहू से विपरीत स्वभाव रखता है। केतू के शिखी, ध्वज, धूम्र, मृत्यु, पुत्र, अनिल नाम है। केतू अध्यात्म प्रेमी ग्रह होता है,परंतु खराब होने की दशा मे मलेक्ष्ता और विचार शून्य कर देता है। राहू अगर विचार है तो केतू कर्म है। विचार शून्य कर्म हमेशा सेवक मे ही मिलता और साफ सफाई की हमेशा कमी दिखती है। यदि केतू अच्छा है, तो ईश्वर भक्त और कर्मठ बनाता है। गंदीगी इसका मौलिक गुण है। केतु एक छाया ग्रह है, बिना विरोध के ज्ञान नहीं आता है और बिना ज्ञान के मुक्ति नहीं है और गणेश जी को पंडितो मे या ज्ञानियों मे सर्वश्रेष्ठ माना गया है। सिर्फ इसी कारण से केतु ग्रह के श्री गणेश आराध्य देवता है। गणेश जी के प्रसन्न होने पर केतु शान्त होते है। राहु, केतु, और शनि को बुरें प्रभावों का जनक माना जाता है।

प्रतिकूल होने पर उपाय या समाधान
केतू
1-बुधवार को गणेश जी के मंदिर में दूर्वा की 11 या 21 गांठ चढ़ाने से मनोकामना पूर्ण होगी।
2. मसूड़ों से रक्त बहने और दुर्गन्ध आने पर (पायरिया) 2 गांठ दूब रोज खाने पर स्वास्थ्य लाभ के साथ बुद्धि प्रखर होगी।
3. मुँह का छाला केतू का परिणाम होता है, दूब का काढ़े से कुल्ले करना हितकर हैं।
4. नकसीर केतू का दुष्प्रभाव है, दूब का रस नाक में डालने से लाभ मिलेगा।
5. रक्त की अशुद्धि केतू का प्रभाव है, 4 गांठ दूब रोज खाने पर रक्त शुद्ध होगा। कोलेस्ट्राल, एच.डी.एल.,वी.एल.डी.एल.के स्तर मे कमी आएगी।
6. ब्लड शुगर केतू का परिणाम है, ताजे पानी मे दूब उबाल कर सेवन करने पर 59 प्रतिशत ब्लड शुगर लेवल कम होगा।
7. रक्त की अशुद्धि केतू का परिणाम है, ताजी दूब 10 ग्राम पानी में उबालकर छान ले, फिर खाली पेट ठंडा पानी सेवन करे, मधुमेह नियंत्रित रहेगी। ग्लूकोज का स्तर भी घटेगा।
8. मलेरिया भी केतू का परिणाम है, दूब के रस में अतीस चूर्ण मिलाकर प्रतिदिन दो-तीन बार लेना लाभकारी है।
9. स्त्रियों सम्बन्धी समस्या- जैसे- सफेद यौन स्राव, बवासीर केतू का परिणाम है, दही के साथ मिलाकर दूर्वा का सेवन लाभकारी है।

राहू
1. एनीमिया मंगल या राहू के प्रतिकूल गुण है, प्रतिदिन दूब के रस को पीने से ठीक हो जाता है।
2. नेत्र ज्योति कम होना राहू का परिणाम है। ब्रह्म मुहूर्त में ओस वाली हरी दूब पर नंगे पाव चलना नेत्र ज्योति उन्नत करेगा और माइग्रेन सही होता है।
3. मंगल या राहू की प्रतिकूलता दाँतों का दर्द, पित्त की गर्मी उत्पन्न करता है, दूब सेवन लाभदायक है।
4. राहु की अशुभता कम करने हेतु प्रतिदिन कस्तूरी, गजदन्त, लोबान एवं दूर्वा जल में मिलाकर स्नान करना लाभकारी है।
5. अल्सर रोग राहू की देन है, दूर्वा घास का फ्लेवनाइड का मुख्य स्रोत होना अल्सर रोग की रोकथाम कर सही करेगा।
6. पेट के रोग राहू से होती है, दूर्वा घास से पेट की बीमारी कम, पाचन शक्ति बढ़ती है और कब्ज, एसिडिटी से मुक्ति मिलेगी।

मंगल
1. मंगल रक्त संचार कारक है, दूर्वा सेवन से रक्त शुद्ध होकर लाल रक्त कणिकाओं मे बढ़ कर हीमोग्लोबिन का स्तर उन्नत होगा।
2. दूर्वा घास एन्टी वायरल और एन्टी माइक्रोबियल (रोगाणुरोधी बीमारी को रोकने की क्षमता) गुण प्रतिरोधक क्षमता उन्नत कर मंगल मजबूत करेगा।
3. दूब से शरीर तंदरुस्त होगा, जिससे मंगल बाली रहेगा।

बुध और चन्द्र
1. बुध चर्म रोगो का कारक है, दूर्वा घास एन्टीइन्फ्लेमेटरी (सूजन और जलन को कम करने वाला) एन्टीसप्टिक का गुण त्वचा सम्बन्धी (जैसे खुजली, त्वचा पर चकत्ते और एक्जिमा आदि) बीमारियों से मुक्ति दिलाएगा।
2. कुष्ट रोग बुध का दुर्परिणाम है दूर्बा घास और हल्दी को एक साथ पीसकर त्वचा पर लगाना कुष्ठ रोग और खुजली से मुक्ति देगा।
3. चन्द्र तरलता कारक है, तो दूर्वा घास का सेवन अनिद्रा, थकान, तनाव जैसे रोगों मे चमत्कारी प्रभावकारी है।
4. चन्द्र का कंजोड़ होना माँ का दूध कम करता है, दूर्वा घास का प्रोलेक्टिन हार्मोन महिलाओ मे नवजात के लिए दूध बढ़ा देगा
5. चन्द्र का प्रतिकूल परिणाम है सर्दी, खाँसी एवं कफ विकारों। दूब प्रतिरोधक क्षमता उन्नत रोग नियंत्रित करेगा।

निष्कर्ष – भारतीय संस्कृति मे विवाह विधानों मे दूब, हल्दी और सारसो तेल हरिद्रालेपन जैसे संस्कारो मे उपयोग मे लाया जाता है, ये सब इन्ही औषधीय गुणो के कारण है अर्थात इन उपचारो या उपायो को ग्रहो के नाम पर ही सही उपयोग मे लाएगे, तो ग्रह खराब ही क्यो होंगे। प्रकृति की रक्षा हमारा पहला कर्तव्य है, इसमे चूक करना, आपको संकटों मे ला सकता है, इसलिए पहले प्रकृति की सेवा करना सीखे, ग्रह अपने आप सूधरेगे।
ज्योतिषाचार्य डॉ उमाशंकर मिश्र सिद्धिविनायक ज्योतिष एवं वास्तु अनुसंधान केंद्र विभव खंड 2 गोमती नगर एवं वेद राज कंपलेक्स पुराना आरटीओ चौराहा लाटूश रोड लखनऊ 94150 87711