फिर होगा सरकारी तमाशा

भौमेंद्र शुक्ल
भौमेंद्र शुक्ल

 

 

 

 

 

 

 

लखनऊ। कुछ ही दिनों में गांधी जी की 150वीं जयंती के समारोह समापन का सरकारी महाकुंभ शुरू होने जा रहा है। केन्द्र सरकार इसे एक बड़े इवेंट के रुप में मनाने जा रही है। देश के कई कोनों से तरह-तरह के साधुओं के अखाड़े प्रकट होकर गांधी के गुण, उनके प्रिय भजन गाएंगे और सरकार रामधुन में मगन रहेगी। अखबार और खबरिया चैनलों में गांधी जी के शाकाहार और सदाचारी जीवन को अनुकरणीय बताया जाएगा। इसके साथ-साथ जगह-जगह सरकारी खर्च पर गोष्ठियां वगैरह आयोजित की जाएंगी।

विशाल जनांदोलन के रणनीतिकार

दंभी फूहड़पने से कहा जाएगा कि देश को आज फिर गांधी जी की राह पर चलने की जरूरत है, वगैरह-वगैरह। यह सब इतने सुनियोजित तरीके से किया जाएगा कि इसकी शोर में बेरोजगारी, आर्थिक बदहाली और गिरती जीडीपी की खबरें दबा दी जाएंगी। पूरा देश गांधी मय नजर आएगा।  याद करिये 1917 के चंपारण सत्याग्रह को कितने अश्लील तरीके से मनाया गया और वो भी करोड़ों रुपये फूंक कर। अब विडंबना देखिए, गांधी जी को एक अवतार पुरुष बता रही पार्टी की एक सदस्या ने पिछले दिनों चुनावी माहौल में गांधी जी के पोस्टर पर गोली चलाई थी। इसी पार्टी की एक अन्य सदस्या ने गांधी के हत्यारे गोडसे की तारीफ करते हुए उनको गांधी से बड़ा युग पुरुष बताया। क्या हमारा नेतृत्व समझता है कि युग पुरुष, होता क्या है? गांधी उनकी समझ में नहीं आते, क्योंकि गांधी एक विशाल जनांदोलन के रणनीतिकार थे, जिन्होंने अपने विचार और आंदोलन की राह कई बार वक्त की जरूरत के अनुसार बदली थी? लेकिन साध्य और साधन की पवित्रता का अनुपात उन्होंने कभी गिरने नहीं दिया।

सार्वजनिक कर्मकांड आयोजित करे?

आज पांच ट्रिलियन की इकोनॉमी की मंजिल पाने के लिए हर रंगत की विदेशी पूंजी न्योतने, आदिवासियों से अधिग्रहीत जमीन कारखानों तथा खदानों के लिए बेचने और इस मुहिम के तहत दलितों, अल्पसंख्यकों के संवैधानिक हकों को संदूक में डालने का जो रास्ता अख्तियार किया गया है, उस पर गांधीजी होते तो आज की तारीख में क्या कहते, यह सोचना दिलचस्प होगा। अपने अवतार पुरुषों के अभिनंदन में हम किसको प्रणाम करते हैं? राजनेताओं की क्या मजबूरी है कि पार्टी के बड़े लोग गोडसे को आप्त पुरुष मानें, और गांधी को छुटभैय्ये गली-गली गरियाते फिरें, फिर भी हर दो अक्टूबर को सरकार उनके पुण्य स्मरण का सार्वजनिक कर्मकांड आयोजित करे? हर विदेशी राजनीतिक मेहमान से तामझाम सहित राजघाट पर फूल चढ़वाए? दरअसल गांधी की स्थिति आज बहुत कुछ गौतम बुद्ध की तरह होती चली गई है। दोनों के मरणोपरांत उनके शिष्यगणों की अगली पीढ़ी पहले झगड़ालू वैचारिक संघों में बंटी, फिर वे राज्याश्रयी होकर विशाल शैक्षिक परिसंपत्तियों, पुस्तकालयों के मालिक बने। इसके बाद बुद्ध और गांध की निरंतर घूम-घूम कर जन-जन के बीच सही धम्म का प्रचार करना छोड़ उनके अनुयाई आसपास के निरक्षर गरीब ग्रामवासियों से दूर अपने ज्ञान को अपने ही मठों तक सीमित रखने लगे।

सरेआम संविधान तथा लोकतांत्रिक मूल्यों की धज्जियां..

11वीं सदी तक बौद्ध भिक्षुगण स्थानीय लोगों से इस कदर कट चुके थे कि जब विदेशी आक्रांताओं के हमले हुए, तो वे तटस्थ रहे और नालंदा, तक्षशिला सब खंडहर बन गए। यही गांधी के अनुयाइयों के साथ भी हुआ, और आज 2019 में भी उसी तरह सामाजिक समरसता, सत्य और अहिंसा के जिन मूल्यों के लिए गांधी ने अपने जीवन की बलि दे दी, वे सब कश्मीर से कर्नाटक तक हर कहीं बुरी तरह क्षत-विक्षत हैं, और लोग बाग इस कदर तटस्थ हैं, मानो यह सब हिंसक घटनाएं, सरेआम संविधान तथा लोकतांत्रिक मूल्यों की धज्जियां उड़ाना किसी और ग्रह पर हो रहा हो। क्या अवतारवादी भारत की बुनियादी प्रकृति में ही कुछ है जो उसे बार-बार अपने इतिहास पुरुषों के संदेशों, उनकी बौद्धिक धरोहर से इतना फिरंट, इतना विपरीतगामी बना देती है? राजकीय समारोहों के आईने में देख कर लगता है कि आज बुद्ध या गांधी दोनों अवतारी पुरुष बन गए हैं।

राजनेताओं के लिए अपनी चुनावी दुकानदारी चलाने के वास्ते दोनों का व्यक्तित्व और प्रतिमाएं लगाना या तोडऩा अधिक महत्वपूर्ण है। लेकिन उनके जीवन और संदेशों का मूल समझ कर जनता के बीच उनकी तरह लगातार जा-जा कर उनकी वैचारिक विरासत को लगातार बढ़ाने का काम कौन कर रहा है? बुद्ध ने ईसा पूर्व चौथी सदी की हताश जड़ जनता को जातिप्रथा, सामंतवाद और अनचाहे गार्हस्थ्य जीवन से मुक्ति दिलाई और उनके कई सदियों बाद गांधी ने एक बार फिर सदियों से विदेशियों के हाथ गिरवी पराधीन और भाग्यवादी लोगों को संगठित कर उनको स्वराज और अंतिम सीढ़ी पर खड़े जन का हितैषी बनने का मंत्र दिया। पर उनके आज के उत्तराधिकारियों को सिर्फ 30 जनवरी और 2 अक्टूबर को गांधी की विरासत के नाम पर रामधुन, वैष्णवजन और बहुत हुआ तो बॉलीवुड श्टाइल गांधीगिरी याद आती है।

हम आज भी ज्ञात इतिहास का सही तरह पीछा करते हुए उससे अपने वक्त के लिए सही सबक नहीं ले रहे। हम अवतारों, अतीत के वेतालों और पुरखों की तरह गांधीजी को रूढिय़ों के बीच याद कर रहे हैं। अक्टूबर 2019 को जो मनने जा रही है, वह गांधी की 150वीं सालगिरह नहीं, उनका 150वां श्राद्ध है। हाल के पांचेक बरसों के दौरान जो कुछ घटा और जिस तरह उसे संभव बनाया गया, सार्वजनिक हिंसा जिस सुनियोजित तरीके से फैलाई और चलाई जा रही है, उसे देख कर भी लोग अनजान होने का नाटक कर रहे हैं। कई लोग तो सवाल उठाने को देशद्रोह का पर्याय मानने लगे हैं। दरअसल तमाम महापुरुषों की जयंती ऐसा सरकारी तमाशा बन कर रह गया है बिल्कुल वैसे जैसे किसी मध्यवर्गीय घर में जगराता होता है। कोने में कुछ बूढ़े हल्के सुरों में बतियाते रहते हैं, कामकाजी लोग माता की चौकी को नमस्कार कर निकल जाते हैं। अंत में आरती के समय आरती होती है, परशाद बंटता है फिर जै रामजी की!