इंटरनेट बंद करने पर आत्महत्या की धमकी दे रहे बच्चे

साेनिया सिहं

लखनऊ। प्रदेश सरकार के यूपी हेल्थ सिस्टम स्ट्रेंथनिंग प्रॉजेक्ट के तहत केजीएमयू ने हाल ही में एक सर्वे किया था। इसमें सामने आया कि दस लोगों में एक को गैजेट डिसऑर्डर की बीमारी है। वहीं  छह लोगों में एक सोशल मीडिया डिसऑर्डर से पीड़ित है। 8.93 फीसदी लोगों के इंटरनेट के प्रयोग का प्रमुख कारण सोशल मीडिया है, जबकि 90 फीसदी लोग किसी न किसी तरह के तनाव से पीड़ित है।

बच्चों में तेजी से बढ़ रहे मोबाइल गेमिंग और इंटरनेट की लत के मामले, अभिभावक परेशान

लोग किसी न किसी तरह के तनाव से पीड़ित है। 8.93 % लोगों के इंटरनेट के प्रयोग का प्रमुख कारण सोशल मीडिया है, जबकि 90 फीसदी लोग किसी न किसी तरह के तनाव से पीड़ित है।

अब मोबाइल-इंटरनेट की लत छुड़ाने का तरीका भी मोबाइल पर ढूंढ रहे

शहर के मनोचिकित्सकों के पास इन दिनों मोबाइल और इंटरनेट के लती बच्चों के केस खूब आ रहे हैं। इनमें ज्यादातर किशोरावस्था के हैं। ये बच्चे अब जान देने की धमकी तक देने लगे हैं। इससे इनके घरवाले भी अब समहे हुए हैं। ऐसे में अभिभावक इनकी लत छुड़ाने के लिए कुछ भी करने को तैयार है।

मोबाइल और इंटरनेट के लती बच्चों का इलाज कर रहीं मनोचिकित्सक डॉ. गगनदीप का कहना है कि ऐसे केस एक्सट्रीम पर जा चुके हैं। इसी कारण डायग्नॉस्टिक ऐंड स्टेटिस्टिकल मैनुअल ऑफ मेंटल डिसऑर्डर्स ने मोबाइल गेमिंग को मनोरोग की श्रेणी में रखा है। एक अध्ययन में चौंकाने वाली बात सामने आई है कि मोबाइल गेम को डिजाइन करने के लिए कंपनियां साइकॉलजिस्ट की टीम बनाती है।

यह टीम गेम को इस तरह डिजाइन करवाती है, जिसे खेलने और देखने से शरीर डोपोमिन हार्मोन रिलीज करे। डोपोमिन एक तरह का रसायन है, जिसके रिलीज होने से इंसान रीलैक्स हो जाता है। डॉ. दीपक नन्दवंशी बताते हैं कि पिछले पांच साल में मोबाइल एडिक्टेड मरीजों की संख्या में 40% की बढ़ोतरी हुई है।