हरियाणा कांग्रेस में तेज हुई खेमेबाजी, भूपेंद्र हुड्डा खेमे में शामिल

  • अशोक तंवर के खिलाफ खुलेगा मोर्चा

नई दिल्ली। हरियाणा कांग्रेस के नेताओं के बीच चल रही अंदरूनी उठापठक रूकने के बजाए अब और खुलकर सामने आने लगी है। पार्टी में नेतृत्व के संकट के चलते प्रदेश इकाई अध्यक्ष अशोक तंवर के मनमाने रवैये से आजिज आकर हरियाणा प्रदेश मीडिया प्रभारी विजय कौशिक शुक्रवार को पूर्व मुख्यमंत्री भूपेंद्र हुड्डा खेमे में शामिल हो गए। Cपर जाकर उनके नेतृत्व को स्वीकारते हुए उनका समर्थन किया। माना जा रहा है कि विजय कौशिक इस कड़ी की शुरूआत भर हैं, उनके पीछे एक बड़ी लाॅबी का हाथ बताया जा रहा है, जो देर-सबेर हुड्डा के साथ खड़ी दिखाई देगी। इससे पहले कि कांग्रेस में नेतृत्व को लेकर चल रही रार थम पाती, हरियाणा कांग्रेस में खेमा बदलने की प्रक्रिया तेज हो गई है। हरियाणा में इस साल विधानसभा चुनाव के चलते संगठन में पकड़ बनाने के लिए दो गुटों में संघर्ष चल रहा है। एक तरफ मौजूदा प्रदेश अध्यक्ष अशोक तंवर हैं तो दूसरी ओर पूर्व मुख्यमंत्री हुड्डा ने जोर-आजमाईश कर रहे हैं।

हरियाणा कांग्रेस का एक धड़ा मान रहा है कि पंजाब में कैप्टन अरविंदर सिंह की तर्ज पर हुड्डा ही ऐसी शख्सियत हैं, जो पार्टी को सत्ता में लाने का दमखम रखते हैं। लेकिन, जिस तरह केंद्रीय नेतृत्व की ओर से निर्णय प्रक्रिया में हीला-हवाली हो रही है, उससे बाजी एक बार कांग्रेस के हाथ से निकलती नजर आ रही है। विजय कौशिक पिछले कई दिनों से प्रदेश अध्यक्ष अशोक तंवर के खिलाफ मोर्चा खोले हुए थे। राहुल गांधी के इस्तीफे के बाद कौशिक ने यह अभियान और तेज कर दिया था। इसके लिए उन्होंने 24 अकबर रोड स्थित पार्टी मुख्यालय में भूख हड़ताल तक कर दी थी। कौशिक राहुल गांधी कैंप के उदीयमान नेता माने जाते हैं। वे दिल्ली प्रदेश की युवा इकाई के महासचिव से लेकर हरियाणा यूथ कांग्रेस के उपाध्यक्ष और सेवा दल के संयुक्त सचिव भी रह चुके हैं। हुड्डा के बेटे बिपिन हुड्डा के साथ अच्छे संबंधों के चलते ही कौशिक हुड्डा खेमे में जगह बनाने में कामयाब हो गए।

पिछले कुछ माह से हरियाणा कांग्रेस में जिस तरह की कलह मची हुई है, उससे पार्टी को बड़ा नुकसान तो पहुंचा ही है, साथ में कार्यकर्ताओं का मनोबल भी टूट गया है। केंद्रीय नेतृत्व के संकट ने इस परेशानी को और बढ़ा दिया है। खासकर अशोक तंवर के रवैये ने पार्टी में गतिशून्यता की स्थिति लाकर रख दी है। तंवर अध्यक्ष पद पर रहते पार्टी को नगर निगम चुनावों से लेकर विधानसभा और लोकसभा चुनावों में एक भी सफलता नहीं दिलवा पाए। फिर पार्टी किस कारण से उन्हें अब तक ढ़ोती आ रही है, यह हरियाणा कमेटी के समक्ष यक्ष सवाल बना हुआ है।

दिल्ली की तर्ज पर राहुल गांधी हरियाणा में भी दो या तीन कार्यकारी अध्यक्ष बनाने के पक्षधर थे ताकि प्रदेश में जातीय संतुलन के साथ-साथ कामकाज के स्तर में भी सुधार लाया जा सके। लेकिन, दिल्ली में प्रदेश अध्यक्ष शीला दीक्षित जिस तरह कार्यकारी अध्यक्षों के कुचक्र में फंसी हुई हैं उससे यह प्रयोग हरियााणा में लगता नहीं कि सफल हो भी पाएगा। सूत्रों के मुताबिक कार्यकर्ताओं में यह सोच पनप रही है कि अशोक तंवर के मनमाने फैसलों के चलते प्रदेश कांग्रेस में अजीब सा संकट खड़ा हो गया है। हालात ऐसे हो गए हैं कि गुटों में विभक्त पार्टी के नेता एक दूसरे का कहना नहीं मान रहे हैं। कर्नाटक सरकार के संकट में आने के बाद प्रदेश प्रभारी गुलाम नबी आजाद हरियाणा के लिए समय नहीं दे पा रहे हैं। ऐसे में कार्यकर्ताओं का उत्साह और बुझता जा रहा है।