सूचना आयुक्तों का वेतन और सेवा शर्ते तय करेगी सरकार

नई दिल्ली : केंद्र सरकार ने शुक्रवार को लोकसभा में सूचना के अधिकार (आरटीआइ) कानून में संशोधन से संबंधित विधेयक पेश किया। इसके तहत सरकार को सूचना आयुक्तों का वेतन, कार्यकाल और सेवाशर्ते तय करने का अधिकार दिया गया है। विपक्षी सदस्यों ने इस संशोधन का तीखा विरोध किया है।प्रधानमंत्री कार्यालय में राज्य मंत्री जितेंद्र सिंह ने संशोधन विधेयक पेश किया और यह दावा किया कि इससे आरटीआइ एक्ट को बेहतर तरीके से लागू किया जा सकेगा। जितेंद्र सिंह ने मौजूदा कानून को अधकचरा बताया और कहा कि कांग्रेस के नेतृत्व वाली संप्रग सरकार इसे हड़बड़ी में लाई थी। उन्होंने कहा कि संप्रग के काल में आरटीआइ कानून दस बजे से शाम पांच बजे तक (ऑफिस टाइम) वाला कानून था, जबकि अब आरटीआइ आवेदन कहीं से भी कभी भी किया जा सकता है।

इस कानून में संशोधन के प्रस्ताव का विरोध करते हुए लोकसभा में कांग्रेस के नेता अधीर रंजन चौधरी ने कहा, यह बिल केंद्रीय सूचना आयुक्त की स्वतंत्रता पर खतरा है। उनके सहयोगी शशि थरूर ने इसे आरटीआइ इलिमिनेशन बिल करार दिया। थरूर के मुताबिक संशोधन बिल के जरिये आरटीआइ कानून की संस्थागत आजादी से संबंधित दो बड़े हथियार समाप्त किए जा रहे हैं। राज्य सूचना आयुक्तों को निष्प्रभावी बनाने की तैयारी की जा रही है, क्योंकि सरकार का इरादा उनके वेतन तय करने का अधिकार अपने हाथों में लेने का है। विपक्षी सदस्यों ने मांग की है कि इस विधेयक को स्थायी समिति के हवाले किया जाए। एआइएमआइएम के सदस्य असादुद्दीन ओवैसी ने बिल पेश करने को लेकर मत विभाजन की मांग की। 224 सदस्यों ने बिल का समर्थन किया, जबकि केवल नौ ने उसका विरोध किया। वोटिंग के समय कांग्रेस और तृणमूल कांग्रेस के सदस्य बहिर्गमन कर गए।

मौजूदा आरटीआइ एक्ट में कहा गया है कि मुख्य सूचना आयुक्त का वेतन, भत्ते और अन्य सुविधाएं मुख्य चुनाव आयुक्त के समान होंगी। यही बात सूचना आयुक्त और चुनाव आयुक्त के मामले में भी लागू होगी। संशोधित बिल में कहा गया है कि चुनाव आयुक्तों और सूचना आयुक्तों द्वारा किए जाने वाले कार्य पूरी तरह अलग होते हैं। निर्वाचन आयोग संवैधानिक निकाय है, जबकि केंद्रीय सूचना आयोग वैधानिक संस्था है। कानून में संशोधन से सरकार को केंद्रीय सूचना आयुक्त तथा अन्य आयुक्तों के लिए सेवा शर्ते तय करने का अधिकार मिल जाएगा।