आखिर क्यों बढ़ रहा इतना तनाव, जाने कारण

 लखनऊ। युवाओं में तनाव इस कदर हावी हो रहा है कि वे जरा सा हताश होने पर अपनी जान से भी खेल जाते हैं। पिछले एक हफ्ते के दौरान जम्मू और उसके साथ लगते क्षेत्रों में करीब सात लोगों ने तनाव में आकर अपना जीवन खत्म कर दिया। इसे महज मूर्खता ही कहा जाएगा कि विगत दिवस एक पिता ने जब बेटे को मोबाइल फोन का इस्तेमाल न करने के लिए डांटा तो उसने पिता के रिवाल्वर से खुद को गोली मारकर अपनी जीवनलीला समाप्त कर ली। यूं ही तनाव में आकर ना गंवाएं, बल्कि जिंदगी में आने वाली कठिनाइयों का डटकर मुकाबला करें।

पढ़ाई में असफल रहने के कारण कुछ बच्चों पर मानसिक दबाव बढ़ रहा है। हर परिवार की अपने बच्चों से ज्यादा अपेक्षाएं होती हैं। अधिकतर युवा जिंदगी में आने वाली समस्याओं को बर्दाश्त नहीं कर पाते और वे अपनी बात किसी से साझा तक नहीं करते। अगर कोई भी व्यक्ति तनाव से ग्रस्त हैं तो इसका समाधान है। वे अपना दर्द अपने दोस्तों या निकट संबंधी से साझा कर सकते हैं। अगर वे यह न भी करें तो वे काउंसलिंग भी ले सकते हैं। अभिभावकों को भी चाहिए कि वे पढ़ाई के लिए बच्चों पर दबाव न डालें। नंबर गेम के बजाय बच्चे की प्रतिभा को समझें। जरूरी नहीं है कि जो बच्चा कम नंबर ला रहा है, उसमें प्रतिभा नहीं है। अभिभावक अक्सर अपने बच्चों की तुलना आस-पड़ोस के बच्चों से करते हैं और बाद में उलहाने देते हैं, जिससे बच्चे तनावग्रस्त हो जाते हैं। अभिभावकों को इससे परहेज करना चाहिए और अधिक से अधिक वक्त बच्चों को देना चाहिए।

ये भी हैं जिम्मेदार

 

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तकनीक: यूं तो तकनीक ने जिंदगी को हमारी अंगुलियों में लाकर समेट दिया है। जी, हां! जहां एक ओर तकनीक के जरिये हमारी जिंदगी सरल व सहज हुई है, वहीं दूसरी ओर इसने हमें हमारे अपनों से दूर कर दिया है। हम दोस्तों से वक्त निकालकर मिलने नहीं जाते, अपने दिल की बात किसी से साझा नहीं करते। परिणाम स्वरूप घर या दफ्तर की तमाम समस्याएं दिल में बोझ की तरह लिये बैठे रहते हैं। निश्चित रूप से जीवनशैली का यह बड़ा बदलाव हमारे इर्द-गिर्द तनाव का जाल बिछा देता है।

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काम का बोझ: जैसे जैसे हमारी क्रय-विक्रय क्षमता बढ़ रही है, वैसे वैसे हम पर काम का दबाव भी बढ़ रहा है। असल में कहने की बात यह है हमारी वित्तीय स्थिति तो दिनों दिन बेहतरी की ओर जा रही है लेकिन हमारी मानसिक स्थिति बदतर हो रही है। काम का अतिरिक्त बोझ हमेशा हमें तनाव के कटघरे में लाकर खड़ा कर देता है। हकीकत यह है कि युवा अकसर काम के बोझ से लदे रहते हैं।

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नाइट लाइफ: आजकल युवाओं में एक नया चलन देखने को मिल रहा है। यह है, नाइट लाइफ। युवाओं में रात को जगने की, काम करने की यहां तक अपने शौक पूरा करने के लिए भी रात में जगने की चाह बढ़ती जा रही है। शायद आप यह नहीं जानते कि नाइट लाइफ  हमारे शारीरिक और मानसिक स्वास्थ्य को प्रभावित करती है। यही कारण है कि रातभर की थकान सुबह तनाव में परिवर्तित हो जाती है।

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शिफ्टिंग जॉब: बीपीओ संस्कृति ने जहां एक ओर युवाओं में रोजगार की सुविधा दी है, वहीं दूसरी ओर बड़े ही आराम से तनाव भी परोसा है। दरअसल, जिन लोगों की शिफ्टिंग जाब होती है, वे अकसर सोशल लाइफ  यानी सामाजिक जिंदगी से दूर रहते हैं। दिन के समय सोते हैं और रात के समय पूरी ऊर्जा के साथ काम करते हैं। कुछ-कुछ अंतराल में यह साइकिल उल्टा हो जाता है। नतीजतन न घर को समय दे पाते हैं, न दोस्तों को, न सोसाइटी और न खुद को। ऐसे में तनाव का बढऩा कोई हैरानी की बात नहीं है।

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खेल कूद की कमी: कुछ दशकों पहले तक घर के इर्द-गिर्द मौजूद सभी पार्कों में, खासकर छुट्टियों के दिन, युवाओं का ताता लगा रहता था। कहीं कोई फुटबाल खेलता था तो कहीं कोई बालीबाल खेलता था। किसी के हाथ में बल्ला होता था तो किसी पैरों में स्केट्स के पहिये नजर आते थे। कहने की जरूरत नहीं है कि खेल-कूद से न सिर्फ हम तंदरुस्त रहते हैं वरन मानसिक तनाव से भी दूर रहते हैं। आज जब खेल-कूद से हमारा रिश्ता न के बराबर हो गया है, ऐसे में तनाव का बढऩा लाजिमी है।

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सोशल नेटवर्किंग साइटें: बेशक सोशल नेटवर्किंग साइटों ने हमारे सामने दोस्तों का भण्डार ला खड़ा किया है। हमें क्या पसंद है, क्या नहीं। सब कुछ बड़ी ही सहजता से सोशल नेटवर्किंग साइटों में शेयर किया जा सकता है। बावजूद इसके आप जानते हैं कि युवाओं में तनाव क्यों बढ़ रहा है? क्योंकि सोशल नेटवर्किंग साइटें एक आभासी दुनिया है। यहां असली कुछ नहीं होता। हर चीज नकली है। सोशल नेटवर्किंग साइटों में बैठते ही हम एक मुखौटा ओढ़ लेते हैं। यही मुखौटा हमें चिड़चिड़ेपन और तनाव से भर देता है। तमाम अध्ययन भी इस बात की तस्दीक करते हैं कि सोशल नेटवर्किंग साइटों के कारण तनाव बढ़ा है।

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शौक की कमी: काम से फुरसत हो तो थोड़ा आराम कर लें। अब जीवन का यही फंडा रह गया है। जबकि शौक या कहें किसी भी वस्तु विशेष में खास रुचि करना हमेशा से हमें सकारात्मक ऊर्जा से भरे रखता है। लेकिन अब ऐसा नहीं होता क्योंकि अब हमें जितना वक्त मिलता है, उसमें कमाने की कोशिश करते हैं और बचे समय में आराम की।