यूपी में जल्द मिलेगा लाखों लोगों को रोजगारः सिन्हा

अधीनस्थ सेवा चयन आयोग के चेयरमैन ने ‘नया लुक’ से कहा-

लखनऊ। साल 1988 में बना उत्तर प्रदेश का अधीनस्थ सेवा चयन आयोग इस साल करीब 11 हजार लोगों को रोजगार दे चुका है। अध्यक्ष से लेकर चपरासी तक महज 84 की संख्या रखने वाला यह आयोग साल में 24 परीक्षाएं आयोजित कराने के मूड में है। यूपी में लगातार लीक हो रहे पर्चे और सुस्त पड़ी भर्तियों के बीच ‘नया लुक’ के सम्पादक भौमेंद्र शुक्ल ने ‘अधीनस्थ सेवा चयन आयोग’ के चेयरमैन अरुण सिन्हा से लम्बी बातचीत की। प्रस्तुत हैं अरुण सिन्हा से बातचीत के सम्पादित अंश…

 

नया लुकः भर्तियां कब तक सामान्य हो जाएंगी?

सिन्हाः यह बड़ा सवाल है, हम अपनी उच्चतर क्षमता पर काम कर रहे हैं। यूपी में लोक सेवा आयोग साल 1935 से काम कर रहा है और केवल ग्रुप-ए और बी की भर्ती करता है। वहां 550 से 600 स्टाफ हैं, जबकि ग्रुप सी की भर्ती के लिए इस आयोग का गठन साल 1988 में किया गया। 31 बरसों के इस सफर में हमने 14-15 साल काम किया और करीब इतने दिनों ही बंद रहा है। इसलिए इस आयोग की स्थिरता नहीं है। महज 84 स्टाफ लेकर हम एक साल में 11 हजार लोगों को रोजगार दे चुके हैं।

नया लुकः सरकार की बदनामी हो रही है कि वह नौकरियों का सृजन नहीं कर पा रही है?

सिन्हाः अधीनस्थ सेवा चयन आयोग इस समय बड़ी भर्तियों पर ही काम कर रहा है। हमारी कोशिश है कि बड़ी संख्या वाली भर्तियां जल्द से जल्द पूरी हो जाएं और सरकार को कहने के लिए यह हो जाए कि हमनें इस-इस विभाग में इतनी नौकरियां दीं। कम स्टाफ की कमी से जूझने के कारण हमें दिक्कत जरूर हो रही है लेकिन जल्द ही इसे सुधार लिया जाएगा।

 

 

नया लुकः आपके आयोग की उच्चतर क्षमता क्या है?

सिन्हाः आयोग एक माह में दो परीक्षा यानी कुल 24 परीक्षाएं साल में आयोजित करा सकता है। इसीलिए हम 100 से कम भर्तियों को नजरंदाज कर रहे हैं। बड़ी भर्तियों के बाद हम लोग 100 से कम भर्ती वाले विभाग की ओर रुख करेंगे।

नया लुकः आजकल पर्चे बहुत लीक हो रहे हैं, इसके बारे में आप क्या कहेंगे, आखिर पर्चे कहां से लीक हो जाते हैं?

सिन्हाः चयन के लिए जब परीक्षा होती है, उस समय तीन चरण अपनाए जाते हैं। पहला प्रश्नों की सेटिंग होती है, दूसरा उसकी प्रिंटिंग की बात होती है। पहले दो चरण के बाद तीसरा महत्वपूर्ण चरण आता है, परीक्षा केंद्रों तक उसे पहुंचाना। इन तीनों चरणों में अति गोपनीयता रखी जाती है। फिर आता है चौथा चरण, जिसमें प्रश्नपत्रों की स्कैनिंग होती है। इस चरण तक गोपनीयता का विशेष ख्याल रखा जाता है। अब बात पर्चों के लीक होने की करें तो दो जगह संभावनाएं प्रतीत होती हैं। पहला- प्रिंटिंग प्रेस और दूसरा- परीक्षा केंद्र। यही दो स्थान हैं जहां से पर्चे लीक होने की संभावना रहती है।

नया लुकः आखिर पर्चा लीक होने पर रोक कैसे लगेगी?

सिन्हाः इसके लिए प्रिंटिंग प्रेस के चयन में सावधानी बड़ी जरूरी है। परचों के लिए उस प्रिंटिंग प्रेस का चयन किया जाना चाहिए, जिसका पूर्व का समृद्धशाली इतिहास हो, जो कॉन्फिंडेशल काम करता हो।

नया लुकः यूपी में कई सिक्योरिटी प्रेस हैं, फिर भी इस तरह की चिंता क्यों?

सिन्हाः वैसे तो यह प्रिंटिंग यूपी में होनी ही नहीं चाहिए। अगर आपको गोपनीयता बनाकर रखनी है तो बाहर प्रदेश के राज्यों में प्रिंटिंग का काम कराना चाहिए, क्योंकि यह गोपन का काम होता है। इसलिए दफ्तर में भी कोई नहीं जान पाता कि यह कहां से प्रिंट हो रहा है। भले ही जमाना आरटीआई का हो, लेकिन इसे आज भी गोपनीय रखा जाता है। गोपनीयता इसकी स्ट्रेंथ हैं। हमारे दफ्तर से भी एक बार पर्चा लीक हुआ था, लेकिन तब प्रिंटिंग यूपी से ही हुई थी।

नया लुकः सुना है सीबी पॉलीवाल ने दबाव में अध्यक्ष पद से इस्तीफा दे दिया?

सिन्हाः नहीं, ऐसी कोई बात नहीं है। उन्होंने किसी दबाव में इस्तीफा नहीं दिया है। हम लोगों ने उनके नेतृत्व में जनवरी से लेकर दिसम्बर तक काम किया और कई परीक्षाएं सफलतापूर्वक निपटाईं। हालांकि एक साल आयोग का काम ठप रहा, इसलिए कई बाधाएं जरूर आईं। उन्होंने ही आयोग के कार्य को पटरी पर सरपट दौड़ाया। इसमें राजनीतिक दबाव जैसी कोई बात नहीं है। किसी प्रकार के दबाव की बात नहीं है। पॉलीवाल साहब वरिष्ठ आईएएस अफसर थे। उन्हें इस तरह के अर्दब में लेना कतई संभव नहीं था।

नया लुकः क्या मानते हैं कि आयोग पर कोई राजनीतिक दबाव नहीं आता?

सिन्हाः आयोग पर रानजीतिक दबाव जरूर आता है, लेकिन यह निर्भर करता है कि दबाव कितना माना जा रहा है। पालीवाल ने अपने पूरे करियर के दौरान कभी दबाव नहीं माना, अब यहां मानने वाली बात ही नहीं थी। उनकी बड़ी अच्छी छवि शुरू से ही रही है।

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