न फनकार तुझसा तेरे बाद आया, मोहम्मद रफी तू बहुत याद आया

रामगोपाल विशारद
गायक मोहम्मद अजीज द्वारा गाया फिल्म क्रोध का यह गाना शायद ही कोई शख्स ऐसा हो, जो रफी साहब का दीवाना हो, न याद हो या फिर इस गीत को सुनकर उसके आंखों में अपने अजीज को खोने के आंसू न निकले। रफी साहब थे ही ऐसे इंसान ! न सिर्फ अपनी शख्सियत से बल्कि एक ऐसे फनकार जिनकी जगह लेने वाला गायकी की दुनिया में फिर उनके बाद अभी तक कोई नहीं आया।

आज 24 दिसम्बर है। आज ही के दिन दुनिया को रफी के रूप में एक अनोखा गीतकार मिला था। अनोखा इसलिए कि जिस जमाने में रफी साहब गायक हुए, उस जमाने में गायक बनाने वाले संगीत संस्थान नहीं होते थे, अ​गर इक्का दुक्का थे भी तो हर कोई उसमें जाने की हिम्मत नहीं करता था। रफी जो भी थे, प्रकृति की देन थे। उनकी गायकी में जादू था। आज भी उनके गाए गीत सुनकर मन शांत हो जाता है। बस, यही मन करता है कि रफी गाते जाएं और हम सुनते जाएं! बस सुनते जाएं।
24 दिसम्बर 1921 को अमृतसर से लगभग 25 किलोमीटर दूर कोटला सुल्तान सिंह के मजीठा ब्लाक में हाजी अली मोहम्मद के घर पैदा हुए मोहम्मद रफी को बचपन से ही गुनगुनाने की आदत थी। वह जब थोडा बडे हुए तो उन्हें उनके बडे भाई के पास लाहौर भेज दिया। जहॉ उनको एक नाई की दुकान पर बिठा दिया गया। वे अक्सर नाई की दुकान पर गुनगुनाते रहते थे और गुनगुनाते हुए अपना काम करते थे।

नाई की दुकान बना टर्निंग प्वाइंट

मोहम्मद रफी को बचपन से ही गुनगुनाने का शौक था। वे अक्सर उनके गांव में आने वाले एक फकीर का गाना गुनगुनाते फिरते थे। जिसके बोल थे, खेलने के दिन चार रे मईया, खेलने के दिन चार…। गुनगुनाते के इस आदत के चलते वह हमेशा अपने पिता और चाचाओं की डॉट खाते और कभी कभी इसी बात को लेकर उनकी पिटाई तक होती। इसी गुनगुनाने की आदत के चलते उनको स्कूल से भी निकाल दिया गया।
रफी जब लाहौर में एक नाई की दुकान पर काम करने लगे तो यह नाई की दुकान ही उनकेे कैरियर का टर्निंग प्वाइंट साबित हुआ। हुआ यूॅ कि इनके दुकान पर एक दिन लाहौर रेडियो स्टेशन से जुडे एक साहब आ गये। यह साहब कोई और नहीं फिरोज निजामी थे। जो पंचाली आर्ट पिक्चर्स से भी जुडे थे।

फिरोज निजामी बने रफी के खेवनहार

रफी की गायकी से प्रभावित होकर निजामी साहब ने उन्हें लाहौर स्टेशन आने को कहा और चले गए। गायन के दीवाने रफी भला कहां चूकने वाले थे, पहुंच गए लाहौर रेडियो स्टेशन। वहां निजामी साहब ने उनकी आवाज में एक कविता रिकार्ड कराई और उसे प्रसारित किया। उसके बाद वह इस रेडियो स्टेशन के सम्मानित सदस्य हो गए। रफी के गाने रेडियो के माध्यम से शहर से गांवों तक गूंजने लगे। लोग जब रफी की आवाज में कोई गाना सुनते तो झूम उठते । धीरे धीरे रफी की डिमांड बढने लगी। लोग रफी की आवाज में गाना सुनने के लिए स्टेशन को चिट्ठियां भेजने लगे। अब रफी एक मशहूर गायक बन चुके थे। बडे भाई ने भी अब रफी को नाई की दुकान से हटाने में जरा भी देर नहीं की और उनकी गायकी और संगीत को निखारने के इंतजामों में लग गए। उन्होंने हरसम्भव सभी व्यवस्थाएं रफी के लिए कीं।
उस जमाने में लाहौर भी फिल्म इंडस्ट्री का एक केन्द्र हुआ करता था। इस इंडस्ट्री की एक पंजाबी फिल्म में रफी जी को गाने का मौका मिल गया। फिल्मों में गायन की रफी की यह शुरूआत थी। धीरे धीरे रफी साहब गायकी की दुनिया के बेताज बादशाह बन गए और आज भी उनकी वह बादशाहत कायम है।

31 जुलाई 1980 को एक गीत की रिकार्डिंग करते समय रफी साहब को हार्ट अटैक पडा और वहीं उन्होंने अंतिम सांस ली। रफी साहब को उनकी गायकी के लिए भारत सरकार, कई संस्थाओं द्वारा सम्मानित भी किया गया। साल 1948 में देश के प्रथम प्रधानमंत्री पंडित जवाहर लाल नेहरू ने स्वतंत्रता दिवस के अवसर पर रफी साहब को रजत पदक से सम्मानित किया था। साल 1965 में भारत सरकार ने उन्हें पद्मश्री अवार्ड से नवाजा। 1960 में रफी साहब को फिल्म फेयर सम्मान भी मिला। इन्हे पॉच बार नेशनल आवार्ड और छह बार फिल्म फेयर आवार्ड से नवाजा गया। उनकी शानदार गायकी ने कई गीतों को अमर बना दिया।

गूगल ने डूडल बना रफी को दी श्रद्धां​जलि

रफी साहब के 93 वें जन्मदिन पर इंटरनेट सर्च इंजन ने अपने मुख्य पृष्ठ पर डूडल बना कर उन्हें श्रद्धां​जलि दी है। यह डूडल मुम्बर्इ के चित्रकार साजिद शेख ने बनाया है। रफी साहब ने अपने गायकी के कॅरियर में 5 हजार से भी ज्यादा गाने गाए। सैकडों गाने तो ऐसे हैं जो सदाबहार बन गए और रफी की आवाज में अमर हैं।