सूर्य पूजा में यह ध्यान रखेंगे तो कट जाएंगे सारे कष्ट और सभी ग्रह हो जाएंगे बलवान

ज्योतिषाचार्य राकेश पांडेय

यदि आप ग्रह दोष से पीड़ित हैं तो परेशान न हों, आप ग्रहों के देव यानी ऊर्जा के देवता सूर्य की पूजा कर सभी ग्रहों को प्रसन्न कर सकते हैं। ज्योतिष के अनुसार जो व्यक्ति सूर्य पूजा करता है उससे सभी ग्रह प्रसन्न रहते हैं। शास्त्रों के अनुसार जो व्यक्ति सूर्य पूजा करता है उसे बल, बुद्धि, विद्या और यश सभी प्राप्त होते हैं। लेकिन क्या आप जानते हैं कि सूर्य की पूजा कब तक की जाती है।

ज्योतिष शास्त्र के अनुसार सूर्य पूजा के लिए समय का ध्यान रखना बेहद आवश्यक होता है, इसलिए सनद रहे कि मनोवांछित फल पाने के लिए सूर्य पूजा समयानुसार ही करें। शास्त्रों में वर्णित है कि हमेशा उगते सूर्य को जल अर्पित किया जाता है। सर्दियों के दिनों में यह समय थोड़ा सा आगे बढ़कर आठ बजे तक हो जाता है। वहीं गर्मियों में पांच से छह के बीच में सूर्य पूजा अवश्य कर लेनी चाहिए। उसके बाद अर्पण किया हुआ जल मनोवांछित फलकारक नहीं बन पाता। उगते हुए सूर्य का पूजन उन्नतिकारक होता हैं। इस समय निकलने वाली सूर्य किरणों में सकारात्मक प्रभाव अत्यधिक होता है, जो शरीर को भी स्वास्थ्य लाभ भी पहुंचाती है।

प्राचीन काल से चली आ रही है सूर्य पूजा की परम्परा

सूर्य पूजा के  लिए क्या है जरूरी

पुराणों के अनुसार रोजाना सूर्य पूजन के लिए आवाहन, आसन की जरूरत नहीं होती है। सूर्य अकेले ऐसे देवता हैं, जो प्रत्यक्ष दिखाई देते हैं। सूर्य पूजन के लिए तांबे की थाली और तांबे के लोटे का उपयोग करें। लाल चंदन और लाल फूल की व्यवस्था रखें। एक दीपक लें। लोटे में जल लेकर उसमें एक चुटकी लाल चंदन का पाउडर मिला लें। लोटे में लाल फूल भी डाल लें। थाली में दीपक और लोटा रख लें।

अब ऊँ सूर्याय नमः मंत्र का जप करते हुए सूर्य को प्रणाम करें। लोटे से सूर्य देवता को जल चढ़ाएं। सूर्य मंत्र ‘ऊं घृणि सूर्य देवाय नमः’ का जप करते रहें। इस प्रकार से सूर्य को जल चढ़ाना सूर्य को अर्घ्य प्रदान करना कहलाता है। 11 बार ऊँ घृणि सूर्य देवाय नमः मंत्र जप करने के बाद 12 बार ऊट सूर्याय नमः अर्घं समर्पयामि कहते हुए पूरा जल समर्पित कर दें। जल चढ़ाते समय नजरें लोटे के जल की धारा की ओर रखें। जल की धारा में सूर्य का प्रतिबिम्ब एक बिन्दु के रूप में जल की धारा में दिखाई देगा। जल देते समय दोनों भुजाओं को इतना ऊपर उठाएं कि की धारा में सूर्य का प्रतिबिंब दिखाई दे। शास्त्रों में वर्णित है कि सूर्य देव का जन्म परमात्मा की आंखों से हुआ था, इसलिए उनका प्रतिबिम्ब देखना भगवददर्शन के बराबर फलकारी होता है। जल अर्पित करने के बाद आरती करें। सात प्रदक्षिणा करें व हाथ जोड़कर प्रणाम करें। याद रखें कि जल में लाल कुमकुम या लाल फूल के अलावा कुछ भी न डालें।

(लेखक भारत के प्रकांड ज्योतिषाचार्य हैं, लखनऊ एवं गोरखपुर में निवास)