ठाकुरों की ठसक

सवर्णों के बीच कांग्रेस का जनाधार घटने के बाद यूपी चुनाव में ठाकुर वोट का बंटवारा केवल समाजवादी पार्टी और बीजेपी के बीच होता रहा है। अमर सिंह और राजा भैया के पीछे ठाकुर नेता लामबंद होते रहे। वहीं गोरक्षपीठ के उत्तराधिकारी बनते ही पूर्वांचल के राजपूतों का गढ़ गोरक्षपीठ हो गया था।
उनके अलावा राजनाथ सिंह के साथ यूपी के भूमिहार और ठाकुर बड़ी मात्रा में एकजुट होते रहे हैं। सीएम योगी आदित्यनाथ के लिए अपनी सीट छोड़ दी थी एमएलसी यशवंत सिंह ने अमर सिंह के खराब स्वास्थ्य को देखते हुए समाजवादी ठाकुर राजा भैया के साथ एकजुट हो गए। अब राजा भैया और योगी की नजदीकियों की वजह से पूरे सूबे के राजपूत योगी की छत्रछाया में हैं। पूर्व मुख्यमंत्री राजनाथ सिंह के केंद्र जाने के बाद खाली हुए उस पद के लिए योगी आदित्यनाथ बखूबी भर रहे हैं। यही कारण है कि एक दैनिक वेतनकर्र्मी अजय सिंह को उन्होंने विशेष सचिव बनाने में गुरेज नहीं किया था।

आशीष श्रीवास्तव
लखनऊ। बात कुछ पुरानी है, लेकिन पूरी कहानी समझने के लिए तीन माह पीछे चलना पड़ेगा। साल 2017 का आखिरी दिन था। सत्ता के गलियारों में खुसुर-पुसुर हो रही थी कि क्या सुलखान सिंह को एक बार और सेवा विस्तार मिलेगा? तभी खबर आई कि 1983 बैच के आईपीएस अफसर और सीआईएसएफ के डीजी ओपी सिंह उत्तर प्रदेश पुलिस के नए मुखिया होंगे। सूबे के सीएम महंत आदित्यनाथ ने उनका नाम फाइनल किया है। उन्हें सूबे के चार वरिष्ठ अफसरों पर वरीयता दी गई और डीजीपी बनाया गया। प्रवीण सिंह. डॉ. सूर्य कुमार शुक्ला, आरआर भटनागर और गोपाल गुप्ता उनसे इस रेस में पिछड़ गए। खबर तेजी से निकली और देखते-देखते पूरे सूबे में पसर गई। जितनी मुंह उतनी बातें। कोई ‘ठाकुर राज’ की बात कर रहा था तो कोई मुलायम सिंह के करीबी अफसर को डीजीपी बनाने का विरोध। साल 1995 में गेस्ट हाउस कांड के समय लखनऊ के कप्तान रहे ओपी सिंह को लेकर राजपूत नेताओं में भी अंतर्विरोध का दौर चल पड़ा।

सूत्रों की मानें तो कभी ठाकुर अमर सिंह के करीबी रहे ओपी सिंह के नाम की सिफारिश रघुराज प्रताप सिंह उर्फ राजा भैया ने सीएम से की थी। लेकिन उनका नाम सूबे के पूर्व मुख्यमंत्री और वर्तमान गृहमंत्री राजनाथ सिंह को बिल्कुल पसंद नहीं आया। इसी कारण आधी जनवरी बीतने तक केंद्र में उनके नाम की कोई चर्चा नहीं हुई। सूबे में चर्चाएं रहीं कि नए डीजीपी जनवरी की चार तारीख को ज्वाइन करेंगे। फिर खबर आई कि 10 तारीख को दिल्ली में प्रेस कॉन्फ्रेंस करेंगे। उसके बाद तैनाती की तारीख 14 हुई लेकिन केंद्र में उन्हें रिलीव करने की कोई प्रक्रिया शुरू नहीं हो पाई थी।

बसपा के प्रदेश अध्यक्ष रामअचल राजभर बसपा के प्रदेश अध्यक्ष रामअचल राजभर कहते हैं कि सीएम आदित्यनाथ जब विपक्ष के नेता थे, तब हमारी पार्टी पर जातीयता का जमकर आरोप मढ़ रहे थे। लेकिन वह खुद अपने सजातीय अफसरों को प्राइम पोस्टिंग दे रहे हैं। बकौल रामअचल, आरआर भटनागर का सेवाकाल अभी दो साल बाकी है। उन्हें भी महानिदेशक की कुर्सी दी जा सकती थी, लेकिन उन्होंने ‘ठाकुर’ अफसर चुनकर अपनी जातीय मानसिकता का परिचय दे दिया। समाजवादी पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष अखिलेश यादव ट्वीट कर तंज कसते हैं कि ये हैं अच्छे दिन। 15 दिन से डीजीपी का पद खाली। वहीं पार्टी के प्रदेश प्रवक्ता राजेंद्र चौधरी कहते हैं कि सपा पर यादववाद का आरोप चस्पा करने वाली बीजेपी के बारे में ज्यादा कहना ठीक नहीं है। पूरे सूबे में ‘टी-सीरीज’ (ठाकुर सीरीज) का राज है। चलो अच्छा है अब कोई हमें यादवों की पार्टी नहीं कहेगा।
सपा के प्रदेश प्रवक्ता राजेंद्र चौधरी
उच्च पदस्थ सूत्रों का कहना है कि ओपी सिंह को डीजीपी बनाए जाने को लेकर प्रदेश और केंद्र सरकार में कुछ मतभेद थे। प्रदेश सरकार ने ओपी सिंह को रिलीव करने के लिए रिमाइंडर भेजा तो शीर्ष नेताओं से सीएम आदित्यनाथ को खुद बातचीत करनी पड़ी। गृह विभाग के एक अफसर कहते हैं कि ओपी सिंह का नाम घोषित करने के 20 दिन बाद अगर राज्य सरकार किसी और को डीजीपी बनाती है तो इससे जनता में केंद्र और राज्य सरकार के बीच टकराव का सीधा संदेश जाता। इसी कारण प्रदेश सरकार ने ओपी सिंह को रिलीव करने के लिए केंद्र को रिमाइंडर भेजा। पार्टी के शीर्ष नेताओं से हुई बातचीत के बाद ओपी सिंह को ही डीजीपी बनाए जाने पर सहमति बनी और दोबारा उनका नाम फाइनल हुआ।
यूपी का बड़ा ठाकुर कौन?
पूरे राज्य में राजपूतों की औसत उपस्थिति पांच से छह फीसदी के बीच है। वहीं पूर्वांचल के जिलों में ठाकुर और भूमिहार मतदाताओं की हिस्सेदारी 10 फीसदी के आसपास पहुंच जाती है। गोरखपुर, कुशीनगर, देवरिया, आजमगढ़, मऊ, बलिया, जौनपुर, गाजीपुर, चंदौली, वाराणसी, मथुरा, आगरा, हरदोई, उन्नाव, रायबरेली, सुल्तानपुर, बांदा, चित्रकूट ऐसे जिले हैं, जहां यादवों के साथ राजपूत तीसरे सबसे बड़े वोट बैंक के लिए कड़ा संघर्ष करते हैं। इसलिए सूबे के दो शीर्ष नेताओं में सबसे बड़ा ठाकुर नेता बनने की जंग है। एक तबका किसी ठाकुर की सिफारिश करता है तो दूसरा तबका विरोध। देखना यह है कि इस टकराव में सबसे बड़ा नेता कौन साबित होता है। विधानसभा चुनाव के दौरान राजनीतिक विश्लेषकों का साफ कहना था कि राजनाथ सिंह के साथ बड़ी संख्या में राजपूत वोटर जाएंगे। वहीं योगी आदित्यनाथ के साथ भी ठाकुर मतों का जाना तय है।
बीजेपी के आबकारी मंत्री राजा जय प्रताप सिंह
कभी समाजवादी पार्टी के प्रमुख ठाकुर नेता रहे अमर सिंह अब मोदी के गुणगान करते फिर रहे हैं। वहीं रघुराज प्रताप सिंह उर्फ राजा भैया सीएम आदित्यनाथ के साथ पहले ही हफ्ते में मंच साझा करते दिखाई दिए थे। सूत्रों का कहना है कि उन्हीं के कहने पर एमएलसी यशवंत सिंह ने अपने पद से इस्तीफा दिया है और अब राज्यसभा की आस लगाए बैठे हैं। नसीमुद्दीन का विरोध कर निलंबन की सजा काट रहे कांग्रेस के वरिष्ठ नेता नेता संजय दीक्षित कहते हैं कि एक वक्त था जब कांग्रेस पार्टी के अहम पदों पर ठाकुर और ब्राह्मण नेताओं का कब्जा था। इन्हें दरकिनार करने की सजा पार्टी को खूब मिली।
यूपी में केवल एक ठाकुर का चलता है सिक्का
सितम्बर 2017 में बातचीत के दौरान ‘नया लुक’ ने गोरखपुर के तत्कालीन सांसद महंत आदित्यनाथ से प्रश्न किया था कि समाजवादी पार्टी में राजपूत मतों का बड़ा हिस्सा जा सकता है? के जवाब में उन्होंने कहा था कि देखते जाइए चुनाव तक अमर सिंह समाजवादी पार्टी में रहेंगे भी या नहीं। आज भले ही तकनीकी कारणों से वह बीजेपी में नहीं हैं लेकिन वह पार्टी का दिल खोलकर गुणगान करते हैं।
ठाकुर वोटों से किसको फायदा
सवर्णों के बीच कांग्रेस का जनाधार घटने के बाद यूपी चुनाव में ठाकुर वोट का बंटवारा केवल समाजवादी पार्टी और बीजेपी के बीच होता रहा है। अमर सिंह और राजा भैया के पीछे ठाकुर नेता लामबंद होते रहे। वहीं गोरक्षपीठ के उत्तराधिकारी बनते ही पूर्वांचल के राजपूतों का गढ़ गोरक्षपीठ हो गया था।
उनके अलावा राजनाथ सिंह के साथ यूपी के भूमिहार और ठाकुर बड़ी मात्रा में एकजुट होते रहे हैं। सीएम योगी आदित्यनाथ के लिए अपनी सीट छोड़ दी थी एमएलसी यशवंत सिंह ने अमर सिंह के खराब स्वास्थ्य को देखते हुए समाजवादी ठाकुर राजा भैया के साथ एकजुट हो गए। अब राजा भैया और योगी की नजदीकियों की वजह से पूरे सूबे के राजपूत योगी की छत्रछाया में हैं।
पूर्व मुख्यमंत्री राजनाथ सिंह के केंद्र जाने के बाद खाली हुए उस पद के लिए योगी आदित्यनाथ बखूबी भर रहे हैं। यही कारण है कि एक दैनिक वेतनकर्र्मी अजय सिंह को उन्होंने विशेष सचिव बनाने में गुरेज नहीं किया था। अजय सिंह वर्तमान में भी सीएम के ओएसडी हैं। साथ ही सूबे में अधिकांश ठाकुर डीएम हैं।
कट्टर हिंदुत्व की छवि है सीएम की
योगी की छवि पूरे देश में कट्टर हिंदूवादी नेता की है। उनके सीएम बनते ही कई सरकारी इमारतें भगवा रंग में रंग गईं। लेकिन गोरखपुर में योगी मुस्लिमों के भी रहनुमा कहे जाते हैं। उन्होंने कई मुस्लिमों के निजी मनमुटावों को अपने यहां सुलझा दिया। एक तरन्नुम नाम की मुस्लिम महिला कहती है कि योगी जी हमारे लिए मसीहा हैं। मेरे उजड़ रहे घर को उन्होंने बसा दिया। वहीं एक अन्य महिला अपना दर्द बयां करती है कि मेरी बेटी की शादी बहराइच में हुई थी।
लड़का सउदी में नौकरी करता था। उसने बिना बताए दूसरी शादी कर ली थी। पुलिस से शिकायत की गई लेकिन कोई सुनवाई नहीं हुई। मामला योगी दरबार में पहुंचा तो पुलिस ने भी शिकायत दर्ज की और लड़के वाले फौरन दौड़ते हुए बात करने आए। गोरखनाथ मंदिर से अपने शहर को संभाल रहे महंत आदित्यनाथ अब सूबे की सत्ता के शीर्ष पर हैं। देखना दिलचस्प होगा कि क्या इसी तरह से वह उत्तर प्रदेश के मुसलमानों के मसीहा बन पाते हैं? क्या वह यूपी के राजपूतों के सबसे बड़े नेता साबित हो सकते हैं?
उत्तर प्रदेश की राजनीति में जातीय समीकरण
जबान पर जन और जेहन में जात,यूपी में चुनाव की सियासी बिसात इसी तरह बिछती है। आधिकारिक आंकड़ों की गैर-मौजूदगी में इस जातीय ब्लूप्रिंट की वैधानिक कीमत भले ही रद्दी की तौल में हो, लेकिन सूबे के दिग्गज इस मोटी पोथी को सीने से लगाए घूमते हैं। साल 2017 के विधानसभा चुनाव में भारी बहुमत से जीत मिली तो पार्टी सीएम चेहरा तलाशने लगी। उस समय कभी गृहमंत्री राजनाथ सिंह तो कभी रेल राज्यमंत्री मनोज सिन्हा का नाम उभरता था। तभी खबर आई कि गोरक्षपीठाधीश्वर को सीएम बनाने के लिए सूबे के एक बड़े ‘राजपूत’ नेता ने कई विधायकों को अपने साथ गोलबंद कर लिया है। उनमें अधिकांश क्षत्रिय विधायक थे। उनका कहना था कि यदि महंत आदित्यनाथ को सीएम नहीं बनाया गया तो हम सब नई पार्टी बनाएंगे और आदित्यनाथ को सीएम बनाकर ही दम लेंगे। इसकी भनक बीजेपी के शीर्ष नेताओं को लगी और मजबूरीवश उन्हें योगी के पक्ष में निर्णय लेना पड़ा।
किसान पीजी कॉलेज में राजनीतिशास्त्र के प्रोफेसर डॉ. सीएम उपाध्याय कहते हैं कि यूपी के चुनाव में विकास, सुशासन, कानून व्यवस्था जैसे नारें कहीं पीछे छूट जाते हैं और जातियों को जोडऩे का खेल शुरू हो जाता है। वह कहते हैं कि योगी शुरू से ही राजपूतों के नेता रहे हैं। अब वह खुद को यूपी का सबसे बड़ा क्षत्रिय नेता मान रहे हैं तो कुछ नया नहीं है। बताते चलें कि यूपी राजपूत आठ फीसदी के आस-पास है। संख्या के हिसाब से यह बड़ी जाति नहीं है, लेकिन राजनीतिक रूप से बड़ी महत्वपूर्ण बिरादरी है। वीर बहादुर सिंह, विश्वनाथ प्रताप सिंह, चंद्रशेखर, राजनाथ सिंह, अमर सिंह और बृजभूषण शरण सिंह जैसे नेता सूबे समेत केंद्र की राजनीति में प्रभावी रहे हैं। इसके साथ ही दूसरे और तीसरे दर्जे के ठाकुर नेताओं की भरी पूरी जमात है। इसका मुख्य कारण है कि राजपूत सामाजिक रूप से दबदबे वाले, ग्रामीण उच्च वर्ग के प्रतिनिधि, लाठी से मज़बूत एवं ओपिनियन बनाने वाले माने जाते हैं। समाज में मज़बूत होने के कारण बूथ मैनेजमेंट में यह प्रभावी जाति मानी जाती रही है। इसीलिए पार्टियों के प्रभावी राजनीतिक नेतृत्व के रूप में यह जाति छाई रही है।