आरटीओ और परिवहन निगम अधिकारियों में तालमेल नहीं

ऐसे तो रुकने से रही ‘डग्गेमारी’
आरटीओ और परिवहन निगम अधिकारियों में तालमेल नहीं
गौरव श्रीवास्तव ‘भारतीय’

लखनऊ। बीती 25 मार्च को दिल्ली से लखनऊ आ रही यूपी रोडवेज की स्कैनिया (यूपी ७० एफटी ०६९८) बस की चेकिंग की गयी तो उसमें महज चार यात्री ही निकले। दिल्ली से लखनऊ तक के बेहद व्यस्त रुट पर स्कैनिया में इतनी कम सवारी का होना पूरी व्यवस्था पर सवाल लगा जाता है। इस घटना पर जवाबदेही तय होनी थी पर थोड़ी बहुत खानापूर्ति के बाद सब कुछ फाइलों में दब गया। कानपुर रोड स्थित एक नामचीन होटल के पास से रोजाना शाम के वक्त दिल्ली जाने के लिए प्राइवेट वातानुकूलित बसें लाइन से खड़ी रहती हैं। इन बसों में जाने के लिए सवारियों की कोई कमी नहीं रहती है। अमूमन आधे से एक घंटे के अंदर एक बस सवारियों से भर कर दिल्ली के लिए चल देती है। इस तरह रात के ग्यारह बजे तक करीब तीन से चार बसे दिल्ली के लिए रवाना होती हैं।

परिवहन आयुक्त कार्यालय और परिवहन निगम के मुख्यालय से महज एक किलोमीटर दूर होटल क्र्लाक्स अवध के पीछे से रोजाना फैजाबाद, बहराइच समेत तमाम दूसरी जगहों के लिए प्राइवेट बस सवेरे से खड़ी होकर सवारी भरती रहती हैं पर इनकी रोकथाम के लिए कोई ठोस प्रयास नहीं किया गया।

ये तो महज एक बानगी है, शहर में अवैध बसों के संचालन की। दिलचस्प बात तो ये है कि आरटीओ से लेकर परिवहन आयुक्त तक और निगम के एआरएम से लेकर प्रबंध निदेशक तक को सब कुछ मालूम है। इसके बावजूद इनके खिलाफ कुछ भी न होना बहुत कुछ कह जाता है। यह कहानी तो सिर्फ राजधानी की ही नहीं है बल्कि प्रदेश के तमाम जिलों में भी यह सुनियोजित खेल अरसे से चल रहा है। कहा तो ये भी जा रहा है कि इसमें कई बड़े नाम शामिल हैं इसलिए इन बसों पर लगाम लगाने की हिम्मत कोई नहीं कर पाता। जब कभी शासन से बहुत दबाव पड़ता है तो कुछ दिन सख्ती बरती जाती है कुछ समय बाद सब कुछ पुराने ढर्रे पर चल निकलता है।

एक परिवहन अधिकारी लखनऊ से दिल्ली रुट पर चल रही प्राइवेट बसों का उदाहरण देते हुए बताते हैं कि इस रुट की बसें करीब सात-से आठ आरटीओ के क्षेत्रों से गुजरती हैं। इतना ही नहीं ये बसें दिल्ली तक रोजाना कम से कम पचास थाने औैर इतने ही चेकपोस्ट पार करती हैं। इनकी रोकटोक कहीं नहीं होती।

अब सवाल उठता है ऐसा क्यों? आखिर इस खेल के पीछे कौन -कौन बड़े लोग शामिल हैं? इन पर नकेल क्यों नहीं डाली जाती? इसकी पड़ताल करने पर सरकारी तंत्र ही कटघरे में खड़ा मिलता है। चाहे सरकार किसी की भी हो पर हकीकत ये है कि किसी भी सरकार ने इस पर गंभीरता से मंथन नहीं किया। एक वरिष्ठ अधिकारी बेहद साफगोई से कहते हैं कि जब तक परिवहन आयुक्त और परिवहन निगम के प्रबंध निदेशक के बीच तालमेल नहीं होगा तब तक इसे रोकना नामुमकिन है।

डग्गेमार बसों से नुकसान परिवहन निगम का हो रहा है पर वह चाह कर भी इनके खिलाफ बड़ी कार्यवाही नहीं कर सकता क्योंकि इन बसों को पकडऩे और बंद करने की कमान परिवहन आयुक्त के पास है। कुछ अपवाद छोड़ दिये जायें तो दोनों ही पदों पर अलग-अलग आईएएस बैठते हैं। दोनों के कार्यक्षेत्र और जिम्मेदारियां भी अलग-अलग हैं। होता यही आया है कि इस गंभीर मसले पर दोनों ही विभाग ने एक होकर बसों के इस अवैध संचालन को रोकने की ठोस कवायद नहीं की। शासन स्तर से भी कोई ठोस कार्ययोजना इसको लेकर नहीं बनी है। ऐसे में परिवहन विभाग इसको लेकर गेंद आयुक्त के पाले में डाल देता है और आयुक्त कार्यालय के अफसर निगम पर जिम्मेदारी थोप देते हैं।

पिछली सपा सरकार के वक्त दोनों ही पद पर रविन्द्र के नायक तैनात थे। उस वक्त डग्गेमारी पर काफी हद तक रोक लगी थी। परिवहन विभाग के जानकार कहते हैं कि आयुक्त और निगम के प्रबंध निदेशक पद पर एक अधिकारी की तैनाती से दोनों विभागों में समन्वय बेहतर होता है। बेहतर तालमेल होने के कारण इस बसों की रोकथाम टीमवर्क के साथ संभव होती है।
रोडवेज के प्रवक्ता के मुताबिक इस वक्त प्रदेश में करीब 12 हजार बसें दौड़ रही हैं और अवैध रुप से चल रही बसों का कोई अधिकृत रिकार्ड सरकार के पास नहीं है। पिछले वित्तीय वर्ष 2017-18 के लिए परिवहन निगम ने 122.69 करोड़ का लाभ कमाया था।

विभागीय अधिकारियों का कहना है कि अगर अवैध तरीके से चल रही बसों पर अंकुश लग जाए तो निगम लगभग 500 करोड़ के सलाना लाभ हासिल कर सकता है। जिससे परिवहन निगम में कार्य कर रहे संविदा व आउटसोर्स कर्मचारियों को नियमित करने का रास्ता भी आसान हो जाएगा। बहरहाल हालत तो यही बता रहे हैं कि इन बसों के संचालन पर नकेल डालना बहुत मुश्किल काम है क्योंकि ये बसे आरटीओ के जिम्मेदारों से लेकर पुलिस थानों तक तक का ‘भला’ कर रही हैं।
अगर अंकुश लगे तो बढ़ेगा निगम का मुनाफा

हाल ही में वित्तीय वर्ष 2017-18 के लिए परिवहन निगम के 122.69 करोड़ लाभ के लिए पुरस्कृत किया गया था। अगर डग्गेमार वाहनों पर पूर्णतया अंकुश लगा लिया जाए तो विभाग लगभग 500 करोड़ के लाभ पर चला जाएगा। परिवहन निगम में कार्य कर रहे संविदा व आउटसोर्स कर्मचारियों को नियमित करने का रास्ता भी आसान हो जाएगा।

‘जिम्मेदारी आरटीओ की ‘
रोडवेज के जनसंपर्क अधिकारी अनवर अंजार डग्गेमार बसों के संचालन पर सवाल पूछते ही बोलते हैं कि हां ये सही है और सबको मालूम है कि यह सब चल रहा है। वे खुद ही सवाल करते हुए कहते हैं कि परिवहन निगम क्या कर सकता है? निगम तो इसका परमिट तक जारी नहीं करता है। वे कहते हैं कि हमारे पास ऐसा कोई अधिकार नहीं है जिससे हम इनकी रोकथाम कर सकें।

निगम सिर्फ बेहतर बस संचालन के लिए जिम्मेदार है। इन बसों को पकडऩा परिवहन आयुक्त कार्यालय और आरटीओ का काम है। वे साफगोई से कहते हैं कि बसों के रुट निर्धारण, इनके परमिट जारी करने की जिम्मेदारी परिवहन आयुक्त कार्यालय की है। इन बसों को पकडऩे की लिए भी आरटीओ(प्रवर्तन) जैसे अधिकारी भी जिलों में तैनात हैं। उनके पास इसके लिए फोर्स भी होती है अब ऐसा क्यों नहीं हो पा रहा है इसका जवाब तो वो ही बेहतर बता सकते हैं। वे कहते हैं कि नये प्रबंध निदेशक रोडवेज की स्थिति को और बेहतर करने, बसों का संचालन और अच्छा करने में लगे हुए हैं। यह बसें हमारा राजस्व नुकसान कर रहीं हैं। जल्द ही इस पर भी कोई कार्यवाही करेंगे।
अनवर अंजार,जनसंपर्क अधिकारी, उप्र परिवहन निगम